Tuesday, 2 March 2021

चिन्ता छोड़ो और खुश रहो --109

चिन्ता छोड़ो और खुश रहो
शान्ति-सदभाव बढ़ाते चलो,
              दुखियारों  के  दर्द  मिटा कर 
             जीवन को सार्थक बनाते चलो। 

चाहे कितना कठिन पथ हो 
हँसते और  मुस्कराते चलो, 
           नफरत की दीवार हटा कर 
            सबको  प्यार  बाँटते चलो। 

अधिकारों की अंधी दौड़ में
अपना कर्तव्य निभाते चलो,
           परोपकार का जीवन जीओ 
          सब को खुशियाँ बाँटते चलो। 

सारा जग हो रहा  प्रदूषित 
पर्यावरण को बचाते चलो,
           स्वच्छता का हाथ थाम कर 
           प्रकृति की रक्षा करते चलो। 

मानवता की जय करने को 
संयम- समता के संग चलो,
         जीवन के आडम्बर हटा कर 
         वसुधा को  स्वर्ग बनाते चलो। 

ok 

कुछ यादें और कुछ अहसास --110

देखते ही देखते
कितना कुछ बदल गया
एक छोटी सी गुड़िया  
जो सदा हमारे साथ खेलती थी 
आज सात समुद्र पार चली गई। 

उसके बचपन की ढेरों सौगातें 
बसी है हमारे दिलों में
आँगन में पैंजन की रुनझुन 
तोतले बोलो की मीठी सरगम 
किलकारियों से घर का गूंजना 
खिलखिला कर हँसना 
अँगुली पकड़ कर चलना 
लगता है जैसे कल की बातें हैं। 

सत्तरह वर्ष की उम्र में 
चली गई अमेरिका पढाई करने
आज कर रही है वहाँ जॉब 
कुछ वर्षों में हो जाएगी शादी 
चली जाएगी अपने ससुराल 
एक नया संसार बसाने
रह जाएगी सदा-सदा के लिए 
हमारे संग उसकी कुछ यादें 
और कुछ अहसास। 

ok
 

केवल सोच बदलने की जरुरत है --118

किसी को देने के लिए केवल 
धनवान होना जरुरी नहीं है,
तन - मन से किया गया 
दान भी कम श्रेष्ट नहीं है। 

आप किसी बेसहारा का 
सहारा बन सकते हैं, 
किसी निराश व्यक्ति का 
उत्साह बढ़ा सकते हैं। 

आप किसी भूखे को 
भोजन करा सकते हैं,
किसी प्यासे को पानी 
पीला सकते हैं।  

आप किसी अनपढ़ को 
पढ़ने में मदद कर सकते हैं, 
किसी वृद्ध का हाथ पकड़ 
रास्ता पार करा सकते हैं। 

आप पुरानी पुस्तकें, कपड़े  
जरुरत मंदों को दे सकते हैं, 
रक्तदान करके किसी का 
जीवन बचा सकते हैं। 

आप किसी बीमार को 
अस्पताल पहुँचा सकते हैं,
किसी आश्रम में अपनी  
सेवाऐं दे सकते हैं। 

आप राह चलते किसी को 
मुस्कराहट दे सकते हैं, 
किसी को आभार प्रकट कर 
खुश कर सकते हैं। 

अपने आस-पास देखिए 
अथाह राहें इन्तजार में हैं, 
आपको केवल अपनी सोच 
बदलने की जरुरत है। 

ok 


पुराने दोस्तों के साथ ---119

पुराने दोस्तों के साथ 
बिताये लम्हों की एक तस्वीर 
आज फाइलों में दबी मिल गईं। 

तस्वीर जो समेटे हैं मेरे 
जीवन के अनमोल पलों और 
विशेष यादों को। 

कुछ यादें तो आज भी ताजा हैं  
मगर कुछ धूमिल हो गईं 
समय के साथ-साथ। 

कुछ दोस्त तो बिछुड़ भी गए 
मगर कुछ अभी भी 
इंतजार में हैं। 

कभी कोई मिल जाता है 
जिंदगी के राहे सफर में  
किसी मोड़ पर। 

तो शुरु हो जाती है 
हँसी-ठिठोली और 
पुरानी यादों की गुगली। 

चलती है बातें लम्बी 
नहीं खत्म होती 
यादों की डोर झटपट। 

किसने क्या पाया और 
किसने क्या खोया का 
बन जाता है एक तलपट। 

ok 





नारी की पीड़ा --120

सदियों से पुरुष नारी को 
भोग्या के रूप में भोगते रहे, 
पुरुष प्रधान समाज में नारी 
देह-दैहिक आनंद देती रही। 

देवता उसे रम्भा, उर्वशी, मेनका
तिलोत्तमा के रूप में भोगते रहे, 
नारी अप्सरा बन केवल 
नृत्य ही करती रही। 

ऋषि- मुनि उसे घृताची, 
मेनका के रूप में भोगते रहे, 
नारी सम्मान की पात्रता के लिए 
सदा तरसती ही रही। 

राजा-महाराजा उर्वशी, शकुंतला
माधवी के रूप में भोगते रहे, 
नारी सदा गरिमामयी प्रतिष्ठा 
के लिए प्यासी ही रही। 

रईस -रसूल वाले गणिका,आम्रपाली
नगरवधू के रूप में भोगते रहे, 
नारी सदा आदर्श पत्नी बनने 
के लिए तड़पती ही रही। 

धर्म के नाम पर देवदासी, रुद्रगणिका
रूपाजिवा के रूप में भोगते रहे, 
नारी सदा जीने के भ्रम में 
बार-बार मरती ही रही। 

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तुम्हारी यादों का संग सफर ---32 B

छुट्टियों के बाद 
मेरा कॉलेज में पढ़ने के लिए जाना 
तुम्हारी आँखों में बादलों का उमड़ना 
आज भी याद आता है। 

छुट्टियों के बाद 
मेरा कॉलेज में पढ़ने के लिए जाना 
तुम्हारे आँखों में बादलों का उमड़ना 
आज भी याद आता है। 

मेरा कॉलेज से लौटने पर 
दरवाजे पर आँखों का टकराना 
दिलों में प्यारत का सागर उमड़ना 
आज भी याद आता है। 

घर की छत पर 
लम्बे बालों को संवारना 
अप्रतिम सौन्दर्य को बिखेरना   
आज भी याद आता है।  

हिमालय की वादियों में 
तुम्हारा हाथ पकड़ घूमना 
उड़ते बादलों संग दौड़ना 
आज भी याद आता है। 

गीता भवन के घाट पर 
गंगा की लहरों संग खेलना 
नाव में बैठ पानी को उछालना  
आज भी याद आता है। 

सागर के किनारे 
नंगे पांव लहरों के संग दौड़ना 
ढेर सारी सीपियाँ चुन कर लाना 
आज भी याद आता है। 


ok 

दीवार पर टँगा हुआ चित्र --30

तुमसे बिछुड़ कर 
मैंने पहली बार अनुभव किया कि 
बिना जान भी जिया जा सकता है
और मैं तन्हाई में जिन्दा भी हूँ। 

मेरे जीवन में 
कोई अस्तित्व का पल नहीं 
जो तुमने छुआ न हो 
कोई साँस नहीं जिसमें 
तुम्हारा अहसास न हो 
कोई याद नहीं जिस पर 
तुम्हारा हस्ताक्षर न हो। 

असीम आनन्द था तुम्हारे सानिध्य में 
जहाँ भी जाता सदा तुम्हारी 
खुशबू मेरे साथ रहती 
अब मेरा कहने को कुछ नहीं बचा है ?

मेरी यादों का घूँघट भी 
अब धुँधला होता जा रहा है
तुम होती तो क्या होता पता नहीं 
शायद खो जाता बाँहों में
निहारता रहता चाँद को। 

अब तो मैं दीवार पर टँगा हुआ 
एक चित्र जैसा हूँ। 

ok