Tuesday, 2 March 2021
यह दिन तो सकुशल गुजर गया --106
यह दिन तो सकुशल गुजर गया
यह रात बस अब ढलने को है,
ये जीवन-सफर तो रीत गया
अब नया सफ़र करने को है।
सारा कुछ तो कर लिया मगर
फिर भी क्यों प्यास बुझी नहीं,
यह आदिकाल से बनी रही
आजीवन तो कभी मिटी नहीं।
इच्छा तो बढ़ती जाती है
वो कभी नहीं घटती प्यारे!
पर ये साँसें तो सीमित हैं
वे कभी नहीं बढ़तीं प्यारे!
है रूप-चाँदनी दो दिन की
क्षणभंगुर है यह जीवन भी,
जो आया है वह जायेगा
कोई नहीं है अनश्वर भी।
अब आवाहित को आना है
इस पंछी को उड़ जाना है,
और कंचन जैसी काया को
कुछ क्षण में ही जल जाना है।
ok
वो पीता है, मैं नहीं --104
मैंने भानु प्रताप से कहा -
इतनी मत पिया कर
ये मौत की सहेली है
इससे दूर रहा कर
वह बोला -
मै कहाँ ज्यादा पीता हूँ
मैं तो सिर्फ एक पेग लेता हूँ
और दिन भर मस्त रहता हूँ
मैंने आश्चर्य से पूछा -
तो फिर क्यों रोज एक बोतल
खरीद कर लाते हो ?
वह एक दार्शनिक के
अंदाज में बोला -
मैं तुमको समझाता हूँ
असली माजरा बताता हूँ
मैं एक पेग पीने के बाद
"मैं " मैं नहीं रहता
मैं "वो" बन जाता हूँ
अब मैं नहीं पीता
वो पीता है और
मैं उसे पिलाता हूँ
इससे दूर रहा कर
वह बोला -
मै कहाँ ज्यादा पीता हूँ
मैं तो सिर्फ एक पेग लेता हूँ
और दिन भर मस्त रहता हूँ
मैंने आश्चर्य से पूछा -
तो फिर क्यों रोज एक बोतल
खरीद कर लाते हो ?
वह एक दार्शनिक के
अंदाज में बोला -
मैं तुमको समझाता हूँ
असली माजरा बताता हूँ
मैं एक पेग पीने के बाद
"मैं " मैं नहीं रहता
मैं "वो" बन जाता हूँ
अब मैं नहीं पीता
वो पीता है और
मैं उसे पिलाता हूँ
आखिर पिलाते-पिलाते
बोतल खाली हो जाती है
और मैं भी लुढ़क जाता हूँ।
ok
आओ पेड़ लगाए --105
देता पेड़ सभी को छाया
जो भी इनके पास में आया,
नहीं भेद है इनके मन में
कोई नहीं है इन्हें पराया।
झूमझूम कर ये लहराते
मानसून के बादल लाते ,
सूरज का ये ताप मिटाते
प्राण वायु हमको दे जाते।
लेकिन आज खड़े ब्यापारी
लेकर हाथों में सब आरी,
शहर गांव में कहीं देखलो
पेड़ों के कटने की तैयारी।
आओ सब संकल्प करें
पर्यावरण की रक्षा करें,
पेड़ों को कटने नहीं देंगे
मिल कर यह प्रयास करें।
पेड़ों को हम मित्र बनाएँ
नए-नए हम पेड़ लगाएँ,
प्रदूषण चिंता का विषय है
पेड़ लगा कर दूर भगाएँ।
ok
कलात्मक सृजनता --114
ताल
कानाताल
पौड़ी गढ़वाल का
सुन्दर, शांत इलाका
छोटा-सा बाजार।
दो दिन से लगातार
हो रहा है हिमपात
लगता है जैसे काश के
फूलों को बिछा दिया
गया है चहुँ ओर।
पहाड़ों पर छितरे हैं
दूर-दूर तक मकान
छतों पर पड़ी हिम
चमक रही है धूप में।
देवदार के पेड़
क्रिसमस ट्री बन गए हैं
झर रही है हिम रुई की तरह
हवा के हल्के झोंके से।
हिम से ढके पहाड़
चमक रहे हैं सूर्योदय
के समय सोने की तरह।
पर्यटकों का मन मोह रहे हैं
बर्फीली वादियों के नज़ारे
चाँदी जैसे गुलज़ार हो गए हैं
देवभूमि के पर्वत।
प्रकृति ने एक सफ़ेद चादर
चांदनी की तरह ओढ़ रखी है
जैसे चाँद छोड़ गया हो
अपनी चांदनी को।
चारों ओर बिखरा पड़ा है
प्रकृत्ति का अनुपम सौन्दर्य
मन को मोह लेती है यहॉं की
कलात्मक सृजनता।
ok
मेहनत उस बूढ़े की --107
मेहनत उस बूढ़े की
कड़कड़ाती धूप में सवारी ढ़ोना,
कमाना दो पैसे
दो जून की रोटी के लिए।
मेहनत उस औरत की
घर-घर जाकर बर्तन माँजना,
कमाना दो पैसे
बेटे को पढ़ाने के लिए।
मेहनत उस मजदुर की
दिन भर ईंट-गारा ढोना
कमाना दो पैसे
परिवार को पालने के लिए
मेहनत उस बच्चे की
दिन भर बूट पोलिस करना
कमाना दो पैसे
बीमार माँ की दवा के लिए
क्या इस देश का गरीब
सदा इसी तरह से
पिसता रहेगा ?
क्या वह जीवन की
मूलभूत आवश्यकताओं के लिए
सदा ही तरसता रहेगा ?
कब आएगा वह दिन
जब एक गरीब भी
सुख से जीवन जी सकेगा ?
ok
श्रद्धा ही श्राद्ध है --108
मैंने श्राद्ध पक्ष में
जिन कौओं को खीर खिलाई
वो ब्राह्मण थे या नहीं,मुझे नहीं पता।
मैंने श्राद्ध पक्ष में
जिन गायों को हलवा-पूड़ी खिलाई
वो ब्राह्मण थी या नहीं, मुझे नहीं पता।
मैंने श्राद्ध पक्ष में
जिस भूखे को भोजन कराया
वो ब्राह्मण था या नहीं, मुझे नहीं पता।
लेकिन मैंने
जो कुछ भी किया
श्रद्धा और निष्ठा से किया।
और पितरों के प्रति
श्रद्धा और निष्ठा से किया
हर कार्य श्राद्ध होता है।
OK
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